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Tuesday, October 1, 2019

रोपणी (रोपाई) ओर मछली पकड़ना


रोपणी


शाम ढलते ही घर में पकवान बनाने की तैयारियां शुरू हो गयी। माँ के साथ बड़ि (ताई ) ओर दादी भी हाथ बताती हैं। पकवान में छोले-आलू, पूरी, गुलथ्या ( हलवा), रोटी, सब्जी आदि को कल के लिए  तैयार करना था, साथ ही चने पकाना, आलू काट-छिल के रखना, पूरी बनाना और अंत में बैलों के लिए मुंडे बटकर तैयार करना। देर रात तक ये तैयारियां चलती ओर अगले दिन बिनसिर (तड़के सुबह) उठकर सभी पकवान तैयार करने मैं जुट जाते साथ में पतेली भर चाय बनाना जिसे बाद में थर्मस में रखना होता था।  किचन में खटबट की आवाज सुनकर, पकवान की खुशबू से हम भी खुशी से सुबह जल्दी उठ जाते, क्योंकि आज रोपाई (रोपणी) का पहला दिन था जिसका हम सभी भाईयों का बेसब्री से इंतजार रहता था। अब गावँ की कुछ महिलाएं ( चाची-ताई, पुफु, दीदी-भूली) भी घर पर आ जाती, फिर सब धूप निकलने से पहले ही घर से खेतों की ओर निकल जाते। किसी के पास नसुडा (हल), तो कोई मयू (रोपणी के लिए), कोई फरवा (फावड़ा), कोई बल्दों (बेलो) को ले जाते। हम सब भाई भी इनके साथ मस्ती भरे कदमो से साथ-साथ जाते। खेतों में पहुँचकर बड़ा आनंद मिलता था क्योंकि रोपणी करने से ज्यादा मस्ती करने का मन करता। थोड़ी देर बाद मां या बड़ि भी पहुँच जाती थीं जिनके पास पकवान (भोजन) से भरा हुआ कण्डा रहता था।

Ropai (ropani)


रोपणी के एक दिन पहले हम सब भाई अपने पुराने कपड़े ढूंढने में लग जाते थे, जिसे पहनकर हमे रोपणी करने जाना होता था, क्योंकि नए कपडे मिट्टी में इंतने गन्दे हो जाते की उनका मैल कई दिन तक निकल नही पाता था। रोपणी तीन या चार दिन चलती लेकिन खेत बटे होने के कारण एक दिन और भी लग जाता था। सबसे पहले दादी-नानी लोग एक खेत से नाज (धान का पौधा) निकलने में जुट जाते फिर उनकी छोटी छोटी गठियाँ बनाकर एक जगह रखती, जिसे बाद में सारे खेतों में रोपणी के बाद बोना ( लगाना) होता था। वहीं जब एक खेत में पूरा पानी भर जाता फिर ताऊ/चाचा नसुडा से बेलों के साथ हल लगाते फिर सभी उस खेत की रोपाई करने में जुट जाते। हल लगाने के बाद मयू लगाना होता जिससे हल द्वारा पलटी हुई मिट्टी औऱ पाणी को आपस में पूरी तरह मिलाकर दलदल कर सके। हम मयू लगने का इंतजार करते थे क्योंकि उसके ऊपर बैठकर बारी- बारी से सवारी जो करनी थी, जिसका आनंद किसी कार या गाड़ी से बढ़कर था। मयू में खड़े होकर बैलों की पूंछ पकड़कर उनको तेज भगाना फिर हाथ छोड़कर स्टंट दिखाना, बडा मजा आता था।

अब हम लोगों का खाली एक ही काम होता था बिडाल (मेंड) लगाना मतलब खेत की मिट्टी को उठाकर किनारों में पोत देना। रोपाई के बाद महिलाओं का काम होता था नाज बोना। उसके लिए दादी- नानी द्वारा कट्ठा किया नाज था । उसको लाने के लिए दौड़कर जाते थे क्योंकि उन गड्डियों को उस खेत में फेंकना पड़ता था जहाँ रोपाई करनी थी। नाज की गड्डियों को फेंकने में बड़ा आनद आता था कि कौन कितनी दूर फेंक सकता है वो भी सीधा खड़ा करके।

नाज की रोपाई

कुछ काम करने के बाद भोजन (नास्ता) का समय भी हो जाता। अब सभी लोग एक जगह में बैठ जाते जिससे थोड़ी थकान भी मिट जाती, फिर मिलकर सब पकवान का आनंद लेते। वो खाना उस समय इतना स्वादिष्ट होता था कि बयां नहीँ कर सकता। हम लोग घर से भी खाके आते थे फिर भी वहां पर दुबारा खाने का आनंद ही कुछ ओर होता था। खाने के बाद फिर सभी काम में लग जाते थे।

मछली पकड़ना


अब दादा जी भी खेतों में पहुँच जाते, फिर हम लोग उनके साथ पास में बहती गाड (नदी) से कूल ( नहर ) में पाणी निकालकर खेतों तक पहुँचाने का काम करते। उसके बाद हम लोग गाड में ही पड़े रहते -कारण मछलियां पकड़ना। बचपन से ही हमे मछली पकड़ने का बहुत शौक था, जो कि दादा जी की देंन थी, किस तरह मछली पकड़ी जाती हैं, कैसे वाल तोड़ना (पानी की धारा बदलना) था, ये सारी बारिकियां दादा जी से ही सीखीं थी।

गर्मियों की छुटियों में जब भी मौका मिलता चुपके से सभी भाई ओर कुछ दोस्त घर से टोकरी लेके जाते, साथ में मछली मारने के लिए अखोड (अखरोट) के पेड़ की पत्तियां, अखोड के छिलके भी ले जाते । कभी कभी चूना भी ले जाते थे, फिर पूरी गाड छान मारते कि कहाँ मछलियों का चारा ज्यादा लगा जिससे पता लग जाता की किस तलो (तालाब) में ज्यादा मछलियां है और किंतनी बड़ी हैं। फिर वहाँ रुककर वाल तोड़ना, उसके बाद अखोड की पत्तियां ओर छिलको को एक पत्थर में कूटकर बारीक बनाते थे। पानी कम होते ही उसको टोकरी में डालकर पानी के अंदर डालते फिर टोकरी से पानी में मिला देते। थोड़ी देर इंतजार करने के बाद मछलियों को नशा लगता फिर हम टोकरी की सहायता से या फिर हाथ से ही मछलियों को पकड लेते थे। मछली पकड़ने का इतना शोक था कि कभी कभी जब माँ हमे जबरदस्ती दिन में अपने साथ सुला देती थी तो हम चुपके से मां की नजरों से छुपकर कमरे से बाहर निकल जाते थे फिर उसके बाद सीधे गाड पहुंच जाते थे मछली पकड़ने के लिए।

चूना ओर अखरोट के पत्ते या  छिलके से कभी-कभी पानी के कीड़े-मकोड़े, सांप आदि को भी नशा हो जाता था। एक बार ऐसा हुआ भी था, मैं टोकरी से चूने को पानी में मिला ही रहा था की टोकरी में सांप आ गया, यह देखकर मेरे अंदर थरूट (कम्पन्न) बेठ गया था। आनन फानन में टोकरी को वहीं छोड़कर पानी से बाहर भागा। फिर डर के मारे कोई भी मछली पकडने के लिए पानी में नही गया। कभी कभी मछली के अलावा अगर केकड़ा भी दिख जाता तो उसको भी पकड़ लेते थे। फिर घर लाकर उसको भूनकर बड़े चाव से खाते थे क्योकि दादा जी कहते थे की ये मेडिसिन (दवाई) का काम करता है, वाकई में ये होता भी बड़ा स्वादिष्ट था। चाइना, जापान जैसे देशों में लोग कीड़े आदि बड़े चाव से खाते है ओर उनका सूप भी पीते हैं।

मछली पकड़ने के बाद गाड में बावती काटना (तैरना) का मजा ही कुछ ओर था। पानी मे कई करतब दिखाना जैसे- साइकिल बावती, मेढ़क बावती, उल्टी बावती या फिर कौन किंतनी देर पानी के अंदर सांस रोक के रह सकता है ओर फिर इस तरह से पानी से ऊपर आना की बालों कि सेटिंग ऐसी लगे जैसे बिल्कुल कंघी की हो। तैरने के बाद पत्थरों के ऊपर लेटकर धूप में सूखना और पीछे पत्थर की गर्मी का आनंद लेना, वो बचपन का  सुनहरा दौर आज भी बहुत याद आता है, जो फिर कभी वापस नही आएगा।

Saturday, September 28, 2019

ढोल-दमाऊं और ब्यौ (शादी)

ढोल-दमाऊं


वो भी एक दौर था जब बिना ढोल-दमाऊं के गौं (गावँ) में कोई भी शुभ कार्य नही होता था तब ढोल की अलग ही छाप थी और अब ये भी एक दौर आ गया जिसमें ढोल दमाऊं का महत्व ही घट गया है जो कि पहले हर काम के लिए महत्वपूर्ण था। ढोल दमाऊं हमारे पहाड़ की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। मुझे अभी भी याद है गांव के औजी (बाजीगर) किसी भी शुभ कार्य में अपने ढोल दमाऊं लेकर पहुँच जाते थे। गांव में किसी नोनू (बच्चा) का मुंडन हो या किसी के घर में पाठ (नवरात्र पूजा) बैठा हो, गावँ की पण्डवार्त ( पांडव लीला), ईगास (दीवाली) हो , चक्रव्यूह हो या किसी का ब्यो (शादी)  या कोई अन्य कार्य हो सबमें ढोल का विशेष महत्व था। गावँ के शुभ कार्य में सबसे पहले बजने वाला ढोल की नौबत (एक ताल) सुनकर दूर से ही मन खुश हो जाता था, जिससे पता लग जाता था कि गौं में किसी के यहाँ कोई शुभ कार्य है। थोड़ी ही देर में गौं के सभी बच्चे  खुश होकर वहाँ इक्कठा हो जाते थे औऱ इसी बहाने स्कूल की भी छुट्टी कर लेते फिर दिन भर वहाँ खेलते कूदते। जब भी ढोल बजता तो उसकी ताल पूरे शरीर में कम्पन्न करके नाचने के लिए मजबूर कर देती। उस समय मन को ओर भी शुकुन मिलता था जब औजियों को ढोल से दूर देखकर उनकी नजरों से छुपकर तुरंत ढोल के पास दौड़ लगाकर उसे अपने हाथ या किसी डंडे से बजाते ताकि उसकी एक आवाज सुन सके।

ब्यो (शादी) 


ढोल दमाऊं के मंडाण (नाच का एक ताल) में नाचने का मजा ही कुछ ओर ही था। आज की शादियों में ढोल-दमाऊं का महत्व घट गया है। क्योंकि उनकी जगह अब बैंड बाजा और डी. जे. ने ले ली है। गांव के लोग अब अपनी पुरानी संस्कृति को भूल गए हैं।  वो भी जमाना था जब पूरी शादी ढोल-दमाऊं और मुशकू बाजू (मशकबीन) पर ही होती थी। मशकबीन की आवाज तो दिल को छू लेती थी जिसको सुनकर बड़ा शुकुन मिलता था, जैसे ही बजता था दुल्हन और उसके परिवार वालों की आखों में आंसू आ जाते थे पर आज ये पारंपरिक बाद्य यन्त्र मशकबीन तो शादी में कहीं विलुप्त सा हो गया है। अब तो मंगल स्नान भी डी.जे. के गानों में हो रहा है। शादी के अवसर पर फेरे के समय गावँ की नौनी (लड़कियां) द्वारा गाया जाने वाला मांगल गीत भी अब कहीँ नही सुनायी देता क्योंकि नयीं पीढ़ी अब पुरानी संस्कृति से दूर होती जा रही है। पहले गावँ के लोग धूमधाम के साथ दूसरे गावँ में बारात लेकर रात को पहुंचते थे फिर उस गावँ के लोग सभी बारातियों का अच्छे से अतिथि सत्कार थे। जहाँ बारात जाती थी उस गावँ के लोग पहले से ही बारातियों की व्यवस्था अपने अपने घरों में कर लेते थे ताकि रात में रहने के लिए किसी को कोई परेशानी न हो। बच्चों को शादी में जाने पर थोड़ा असमंजस की स्थिति रहती थी, किसी के घरवाले छोटे बच्चों को शादी में जाने की इजाजत नही देते थे, लेकिन बच्चे बहुत जिद करते थे, इसलिए कभी-कभी तो घर में पिटाई भी हो जाती थी और जो चले भी जाते थे वो किसी बुजुर्ग की निगरानी में होते थे। गावँ में कुछ बच्चे तो बारात में जाने का मन पहले से ही बना लेते थे चाहे उनके घरवाले लाख मना करे, वे इतने चालक होते थे कि बारात प्रस्थान से पहले ही बस की सीट के नीचे छिप जाते थे ताकि कोई उन्हें देख न सके फिर वो सीधे वहीं पहुँचकर बारात में नजर आते थे।



हमारा शादी में जाने का एक ही मकसद रहता था, वो पीठांई (टिका) का लिफाफा। मतलब जो बारातियो को टीका लगता उसके साथ जो पैसे का लिफाफा मिलता वो। जैसे ही पीठाईं का लिफाफा मिलता उसी समय चेक कर लेते की कितने का नोट है। उस समय ₹5 का भी नोट देखकर मन खुश हो जाता था। कभी-कभी तो कुछ बच्चे पहली पंक्ति से टिका लगाकर बामण (ब्राह्मण) की नजर से छुपकर तुरन्त टिका को मिटाकर पिछाड़ी (अंतिम) वाली पंक्ति में दूसरे लिफाफे के चक्कर में बैठ जाते थे। लिफाफे में मिलने वाला पैसा उस दौर की हमारी जमा पूंजी थी या फिर ननिहाल से घर आते समय नाना-नानी, मामा-मामी, मौसी सभी रिश्तेदारों से मिलने वाला पैसा भी, जो जबरदस्ती हाथ में पकड़ा देते थे फिर मम्मी वो पैसे बाद में देने के नाम पर ले लेती थी जो फिर कभी वापस नही मिलता था। इस तरह दो दिवसीय शादी शांतिपूर्ण निपट जाती थी लेकिन इस नयें दौर की भागा दौड़ी में समय की बचत के खातिर गावँ की जो शादी दो दिन तक चलती थी वो आज वनडे (एकदिन) में ही सिमट के रह गयी है।

गावँ में शादी ही ऐसा माहौल था जिसमे सभी लोग मिलजुल कर काम करते थे, लेकिन अब ये भी देखने को भी नही मिलता क्योंकि वहाँ अब लोग ही नहीं हैं जिसका सबसे कारण है गावँ में पलायन। गावँ में मूलभूत सुविधा जैसे- रोजगार, अस्पताल, स्कूल आदि न होना। जो लोग पहले रोजगार के लिए बाहर थे और परिवार गावँ में था, अब सक्षम होकर परिवार भी अपने साथ ले गए और फिर उन्होंने वापस गांव की ओर कभी मुड़कर नही देखा, इस तरह गावँ में कुछ कुड़ा ( मकान) खंडर हो गए हैं जो धीरे धीरे बढ़ते जा रहे हैं जो अब भूतिया होने की कगार पर आ गए हैं। वर्तमान में यही पलायन अब पहाड़ी गावों की सबसे बड़ी बिड्डमना बन चुकी है, जिनकी अब कोई सुध नही लेता।


Thursday, September 26, 2019

मिट्टी तेल और लैम्प (लम्पू)

लम्पू   

बात उन दिनों की है, जब गांवों बिजली भी गिने चुने लोगो के यहाँ होती थी और जिनके यहां होती भी थी उनको भी लम्पू की आवश्यकता उतनी ही थी जितनी कि जिनके घर बिजली न होती थी। कारण बिजली का कभी भी रात में गायब हो जाना, जैसे कभी बिजली के ट्रांसफार्म का फ्यूज उड़ जाना, और फिर हफ़्तों तक बिजली गुल हो जाना या फिर शाम ढलते ढलते हमेशा बिजली की रोशनी भी कम हो जाना। तब दो ही चारे रहते थे या तो वांटेन का बल्ब (100wt ) लगाना या फिर लम्पू जलाना।

पहाड़ी लम्पू, Pahadi lamp
पहाड़ी लैम्प

चूल्हा

आज भी हम लोग उत्तराखंड में चूल्हे में आग जलाना एक परंपरा का हिस्सा मानते है। अगर चूल्हा न जले तो अपशगुन सा मानते है, ओर इन सब के लिये मिट्टी का तेल ही काम आता है।अब तो शायद लोग मिट्टी का तेल महज 1 या 2 लीटर लेके आते है ताकि मजबूरी के समय काम आ सके, जैसे जब चूल्हे मे आग जलानी हो, पर उस समय ऐसा नही था, तब राशनकार्ड में परिवारों की सदस्यों की संख्या के हिसाब से राशन व मिट्टी तेल मिलता था।

उस समय चिमनी के लेम्प भी आ गए थे ओर लालटेन भी, पर लोग लैम्प ( लम्पू ) को ही महत्ता देते थे क्योंकि इससे मिट्टी तेल की खपत कम होती थी। कभी कभी पढ़ते पढ़ते लम्पू की लो पर देखकर ही नींद की छपकिया आ जाती थी और पढ़ने का मन ही नही करता था। रोज शाम को हाथ मुँह धोकर लम्पू में मिट्टी तेल डालकर, मंदिर में दिया बत्ती करके, ओबरे में चूल्हें के धुँए में खाना खाना, अब ये सब महज एक सपना सा रह गया है। उन दिनों लोग कभी कभी लम्पू के धुंए से हताहत हो जाते थे, तब से सबका नियम होता था, रात को लम्पू को बन्द करके सोया करो या तो इसकी लो कम रखा करो नही तो सुबह तक पूरे कमरे में मस्सा (धुँवा) फैल जाता था फिर हमारी नाक के अंदर धुँए की काली पपड़ी भी जम जाती थी।

चूल्हे में जब लकड़िया ठीक से नही जलती थी, तब बार बार भक्क भक्क करके चूल्हे में जेरकिन के ढक्कन से मिट्टी तेल डालना ओर आग जलाना जीवन भर याद रहेगा, ओबरे (सबसे नीचे कमरा) में धुंआ धुंआ कर देना और खुद भी आंसू आंसू हो जाना। कभी कभी बर्तनों को इतना काला कर देना की घर पर भारी मार भी पड़ती थी। दीवाली में भेलो जलाने के लिए मिट्टी तेल में लबालब भिगोकर "भेलो"  तैयार करना, तब मिट्टी तेल भी हिस्सों में लाया जाता था। तब बांटे लगती थी, थोड़ा थोड़ा मिट्टी तेल और टूटे हुए कंडे स्वालटे लेकर आएंगे ताकि उचित मात्रा में सामग्री जोड़ी जा सके। गांव में अंधेरों में जब बारातियों को लाने के लिए उजाला नही रहता था तब मुछयालु ( मशाल) बनाना ओर सज्जनों को सही ढंग से घर पर लाना भी अव्वल दर्जे का उपाय था।

जब भी हम जैसे लोगों को बचपन की यादें जेहन में आएगी, तब तब "मिट्टी का तेल" और "लम्पू" जरूर याद आएंगे। आज बहुत सी गौं की प्रतिभाएं उन अंधेरो से होकर उजालों में अपना मुकाम ढूढ सकी। ये सिर्फ महज कह देने वाली बात नही है उस समय लम्पू और मिट्टी तेल की आवश्यकता रोटी,कपडा और मकान जैसे ही थी।
- दीपक


How to generate PUC certificate online, प्रदूषण सर्टिफिकेट ऑनलाइन कैसे निकाले

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